देश की आर्थिक वृद्धि दर (जीडीपी) के अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए 7.8 प्रतिशत तक पहुंचने के बावजूद भारतीय शेयर बाजारों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। दलाल स्ट्रीट पर सुस्ती के इस दौर में बेंचमार्क सूचकांकों में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई, जिससे निवेशकों को एक ही सत्र में 12 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा।
गुरुवार के कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 1,100 अंक से अधिक लुढ़क गया, जबकि एनएसई निफ्टी 50 फिसलकर 22,200 के स्तर के करीब पहुंच गया। साल 2026 की शुरुआत से अब तक सेंसेक्स में करीब 15 प्रतिशत और निफ्टी 50 में लगभग 13 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। पिछले सप्ताह बाजार ने अपने इतिहास की 25 वर्षों की सबसे लंबी लगातार आठ हफ़्तों की मंदी का सामना किया था।
अर्थव्यवस्था के मजबूत आंकड़ों और शेयर बाजार में जारी गिरावट के इस विरोधाभास पर विशेषज्ञों का कहना है कि जीडीपी पिछले आर्थिक प्रदर्शन को दर्शाती है, जबकि शेयर बाजार भविष्य की संभावनाओं, कॉरपोरेट मुनाफे, ब्याज दरों और संभावित जोखिमों के आधार पर काम करता है।
वर्तमान में विदेशी निवेशकों की बिकवाली, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, कमजोर रुपया और घरेलू मौद्रिक नीति में सख्ती की आशंका जैसे बाहरी कारक भारतीय बाजार पर दबाव बना रहे हैं। सितंबर महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने दो महीने की लिवाली के बाद 2,56,620 करोड़ रुपये (2.7 अरब डॉलर) की भारतीय इक्विटी बेची, जो छह महीनों में उनका सबसे बड़ा मासिक बहिर्गमन है।
रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर के आसपास कमजोर बना हुआ है, जो जुलाई के बाद से इसका सबसे निचला स्तर है। इसके साथ ही, ब्रेंट क्रूड की कीमतें 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, और अमेरिकी 10-वर्षीय Treasury yield चढ़कर 5.34 प्रतिशत हो गई है, जिससे वैश्विक स्तर पर डॉलर परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ गया है और उभरते बाजारों से पूंजी बाहर जा रही है।
रिसर्जेंट इंडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक ज्योति प्रकाश गाड़िया के अनुसार, जीडीपी वास्तविक आर्थिक गतिविधियों पर आधारित होती है, जबकि बाजार की चाल भविष्य के वृहद आर्थिक परिदृश्य और जोखिमों पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद भविष्य की आय और कॉर्पोरेट मार्जिन पर कच्चे तेल की कीमतों तथा महंगाई का असर पड़ सकता है।
आनंद राठी वेल्थ लिमिटेड की एसोसिएट डायरेक्टर श्वेता रजनी का मानना है कि यह गिरावट भारत के दीर्घकालिक विकास दृष्टिकोण में बदलाव के बजाय मुख्य रूप से अल्कालिक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का परिणाम है। उन्होंने कहा कि घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) की मजबूत लिवाली से संकेत मिलता है कि दीर्घकालिक निवेशक इस सुधार का उपयोग खरीदारी के लिए कर रहे हैं, और निवेशकों को घबराने के बजाय दीर्घकालिक आवंटन पर टिके रहना चाहिए।

