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निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और फॉर्म विवादों से घिरी विश्वसनीयता

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भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) अपनी कार्यप्रणाली, निर्णयों और फॉर्म 6 तथा फॉर्म 7 के विवादों के चलते गंभीर विश्वसनीयता संकट से जूझ रहा है। आयोग पर यह संकट केवल आलोचकों की टिप्पणियों के कारण नहीं, बल्कि साथी चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों और सार्वजनिक विरोध के बीच गहराया है।

विवाद का मुख्य केंद्र जून 2025 में शुरू किया गया मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान है। इस दौरान फॉर्म 6 के साथ एक घोषणा पत्र (Annexure D) जोड़ा गया था, जिसमें आवेदकों को जन्मतिथि के आधार पर नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया था। इस बदलाव को साथी चुनाव आयुक्तों ने ‘अवैध और अनधिकृत’ करार दिया था। आलोचकों और जानकारों का मानना है कि इसके जरिए पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसे प्रावधान लागू करने का प्रयास किया गया।

कानून के जानकारों के अनुसार, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत केवल केंद्र सरकार को नियम बनाने का अधिकार है, और निर्वाचन आयोग इस तरह से एकतरफा संशोधन करने के लिए सक्षम प्राधिकारी नहीं था। सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया था कि अदालत द्वारा कोई भी संशोधित फॉर्म 6 अनुमोदित नहीं किया गया है। इसके बाद आयोग ने 1 अक्टूबर 2026 को सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका है, वहां बिना घोषणा पत्र के फॉर्म 6 का उपयोग किया जाएगा, जबकि अन्य राज्यों में यह जारी रहेगा।

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इसके अलावा, उत्तराखंड, कर्नाटक और अन्य राज्यों में फॉर्म 7 के कथित दुरुपयोग को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। आरोप है कि अज्ञात लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर उन मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन दिए गए, जिनके नाम वैध रूप से सूची में शामिल थे। केंद्रीय डेटा प्रबंधन प्रणाली के कारण निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) और बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने में बाधा आने की शिकायतें भी सामने आई हैं। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और पश्चिम बंगाल के अपीलीय न्यायाधिकरणों के प्रमुखों ने भी तकनीकी प्रणाली की कमियों की ओर इशारा किया है।

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के अनुसार, आयोग के फैसलों और कार्यशैली ने ‘हम, भारत के लोग’ के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने वाले इस संवैधानिक निकाय की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है।

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