नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एक एफआईआर को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि कर्ज वसूली जैसे व्यावसायिक विवादों को जातिगत अत्याचार का रंग नहीं दिया जा सकता और ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है।
न्यायालय ने यह आदेश जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष सुनवाई के बाद दिया। इस मामले में तेलंगाना हाईकोर्ट ने पहले बैंक अधिकारियों की याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया था, जिसके निर्णय से सुप्रीम कोर्ट ने असहमति जताई।
यह पूरा मामला वर्ष 2019 का है, जब हैदराबाद में एक कंपनी के निदेशक वाई राजशेखर ने बैंक अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। एसबीआई ने इस कंपनी को कर्ज दिया था, जो वर्ष 2016 में गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) घोषित हो गया था। कंपनी के निदेशक ने बैंक अधिकारियों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हुए फर्जी दस्तावेज तैयार करने, गलत जानकारी देने और पुनरुद्धार पैकेज देने से इनकार करने का आरोप लगाया था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत में मौजूद विरोधाभासों को भी रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि शिकायत में कंपनी को एससी-एसटी महिलाओं द्वारा प्रबंधित बताया गया था, जबकि कंपनी की प्रबंध निदेशक (एमडी) कोई महिला नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फर्जी दस्तावेजों, गलत जानकारी या पुनरुद्धार पैकेज न मिलने से जुड़े विवादों को उठाने के लिए कर्ज वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) जैसे उचित मंच मौजूद हैं। शीर्ष अदालत ने इन संबंधित मुद्दों को डीआरटी जैसे उचित मंच पर ही तय होने के लिए खुला छोड़ दिया है।

