नयी दिल्ली —
छह साल पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ शाहीन बाग में हुए प्रदर्शनों के बाद अब एक बार फिर मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी को लेकर बहस छिड़ गई है। हाल ही में दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी द्वारा पुरानी दिल्ली की एक मस्जिद में माइक से कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आह्वान पर होने वाले विरोध प्रदर्शन में शामिल न होने की अपील किए जाने का मामला सामने आया है। इस दौरान इमाम ने भी नमाजियों से इस प्रदर्शन में शामिल न होने का आग्रह किया था।
इस घटना के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या आज भी मुस्लिम समुदाय को एक अलग और एकाकार इकाई के रूप में देखा जाता है, जिसे धार्मिक स्थलों और नेताओं के माध्यम से नियंत्रित या प्रभावित किया जा सकता है। पुलिस अधिकारियों द्वारा ऐसे स्थानों से अपील किए जाने की यह शैली पुरानी राजनीतिक प्रथाओं की याद दिलाती है, जहां राजनीतिक दल चुनावों में मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए मस्जिदों और इमामों का रुख करते रहे हैं।
हालांकि, पुलिस ने स्पष्ट किया है कि शाही मस्जिद में की गई यह अपील कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक एहतियाती कदम थी और इसी तरह की अपीलें अन्य सामुदायिक संस्थानों तथा आवासीय संघों के माध्यम से भी की गई थीं। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि केवल मुसलमानों को ही निशाना बनाया गया था। लेकिन इस घटना से यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि शाहीन बाग के दौर से लेकर आज तक क्या बदला है, जहां मुस्लिम परिवारों ने अपने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था, वहीं आज उन्हें ऐसे प्रदर्शनों से दूर रहने की सलाह दी जा रही है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि यह धारणा गलत है कि मुस्लिम समुदाय के विचार या कार्य केवल धार्मिक नेताओं द्वारा तय होते हैं। समुदाय के लोगों की राय स्कूलों, कॉलेजों, दोस्तों के बीच बातचीत, राजनीतिक बहसों और सोशल मीडिया जैसे विभिन्न माध्यमों से बनती है। मस्जिदों का दायरा बड़ा हो सकता है, लेकिन यह सोचना कि मुसलमान इमाम के कहे अनुसार ही चलेंगे, पूरी तरह सही नहीं है। यहां तक कि मस्जिदें भी जाति और समुदाय के आधार पर बंटी हो सकती हैं, और कई मुसलमानों का धार्मिक नेताओं से कोई खास जुड़ाव नहीं होता है।
शाहीन बाग और सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है। शाहीन बाग के दौरान मुसलमानों के सामने नागरिकता से जुड़े सीधे खतरे थे, जबकि सीजेपी के विरोध प्रदर्शन कथित चुनावी अनियमितताओं और जवाबदेही से जुड़े हैं, जो हर भारतीय नागरिक को प्रभावित करते हैं। यदि कोई मुस्लिम नागरिक इन मुद्दों पर अपनी राय रखता है या प्रदर्शन में शामिल होता है, तो उसे एक अलग समुदाय के रूप में क्यों देखा जाना चाहिए? एक छात्र संगठन के माध्यम से जुड़ने वाला मुस्लिम छात्र या चुनावी निष्पक्षता का समर्थन करने वाला नागरिक केवल अपनी व्यक्तिगत क्षमता या लोकतंत्र में आस्था के कारण ऐसा कर सकता है।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार जितना अहम है, उतना ही यह अधिकार भी जरूरी है कि नागरिक यह तय करें कि उन्हें कब, क्यों और किस प्रदर्शन में शामिल होना है। राजनीतिक भागीदारी को केवल इस आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए कि सड़कों पर कितने लोग उतरे हैं या उन्होंने कौन से नारे लगाए हैं। यदि मुस्लिम नागरिक किसी प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लेते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे राजनीति से उदासीन हो गए हैं, बल्कि यह उनकी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और जोखिमों के आकलन को दर्शाता है।
यदि नागरिकों को समान अधिकार दिलाना है, तो उनके हर राजनीतिक फैसले को पूरे समुदाय के एकजुट निर्णय के रूप में देखना बंद करना होगा। विरोध करने के अधिकार में यह स्वतंत्रता भी शामिल है कि नागरिक अपने विवेक से यह तय करें कि उन्हें किस मुद्दे पर आवाज उठानी है और किससे दूर रहना है।

