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धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति मुस्लिम कोटा आरक्षण के हकदार नहीं, सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला

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नई दिल्ली —

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म से इस्लाम में धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति मुस्लिम पिछड़ा वर्ग कोटे के तहत आरक्षण का लाभ पाने के हकदार नहीं हैं। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति उसे गैर-हिंदू धर्म अपनाने के बाद स्वतः सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) या आरक्षण का लाभ नहीं दिला सकती।

न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मद्रास उच्च कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें राज्य सरकार के एक आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तित होता है, वह केवल अपनी पूर्व-स्थिति से जुड़ी सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

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यह कानूनी विवाद वर्ष 2024 के एक सरकारी आदेश से उपजा था, जिसे तमिलनाडु सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश पर जारी किया था। इस आदेश के तहत पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त जातियों और अनुसूचित जातियों से इस्लाम में धर्म परिवर्तन करने वालों को सात अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम संप्रदायों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति दी गई थी। राज्य सरकार की इस दलील को शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया।

अदालत के अनुसार, धर्म परिवर्तन से हिंदू सामाजिक व्यवस्था के तहत जाति-आधारित पिछड़ेपन का कानूनी आधार समाप्त हो जाता है। पीठ ने कहा कि जो व्यक्ति इस्लाम अपनाता है, वह मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी का हिस्सा नहीं बन जाता और उसकी पूर्व-स्थिति उसे पिछड़ेपन का दर्जा प्रदान नहीं कर सकती।

इस मामले की शुरुआत परमेश्वरम नाम के एक व्यक्ति की याचिका से हुई थी, जिन्होंने वर्ष 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया था और अपना नाम समीर अहमद रख लिया था। स्थानीय जिला अधिकारियों द्वारा ‘लब्बाई’ मुस्लिम के रूप में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (बीसीएम) प्रमाण पत्र देने से इनकार करने के बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग ने उनकी सिफारिश की थी और निर्देश दिया था कि इस्लाम अपनाने वाले हिंदू पिछड़ा वर्ग के लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम माना जाए।

मद्रास उच्च कोर्ट ने अपने फैसले में माना था कि लब्बाई, राऊथर, मराक्कायर या दक्कनी मुस्लिम जैसी अधिसूचित मुस्लिम समुदायों की सदस्यता केवल जन्म से तय होती है और इसे धर्म परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उच्च कोर्ट ने माना था कि ये समुदाय धार्मिक संप्रदायों के बजाय विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय हैं, जिससे धर्म परिवर्तन के जरिए इनमें प्रवेश कानूनी रूप से असंभव है। इसी फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।

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