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भारत

दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शनों के निर्धारित स्थलों की सूची से जंतर-मंतर को हटाया

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राष्ट्रीय राजधानी में सरकार और संसद तक अपनी आवाज पहुंचाने के रास्ते धीरे-धीरे और सीमित होते जा रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शनों के निर्धारित स्थलों की सूची से जंतर-मंतर को हटा दिया है। इसके स्थान पर प्रदर्शनों के लिए तीन नए स्थल तय किए गए हैं, जिससे राजधानी में आंदोलनों की पहुंच संसद से और दूर हो गई है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित एक समिति ने मौजूदा निर्धारित स्थलों के विकल्प के तौर पर विरोध प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थानों की समीक्षा की थी। इसके बाद सामने आई नई व्यवस्था के तहत जंतर-मंतर को सूची से बाहर कर दिया गया है। अब प्रदर्शनकारियों के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को आधिकारिक स्थल बनाया गया है। प्रशासन इन तीनों नए स्थानों पर प्रदर्शन और धरने आयोजित करने के लिए अलग से मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करेगा।

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के स्थान बदलने का यह इतिहास काफी पुराना है। एक समय था जब संसद भवन और इंडिया गेट के नजदीक स्थित बोट क्लब धरना-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। वर्ष 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर भारी संख्या में किसानों ने जुटकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर बड़ा दबाव बनाया था। सरकारी दफ्तरों के करीब होने के कारण इन प्रदर्शनों पर राजनीतिक हलकों की सीधी नजर रहती थी।

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हालांकि, सुरक्षा और यातायात से जुड़ी चिंताएं बढ़ने के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शनों को सीमित कर दिया गया। वर्ष 1993 के आसपास जंतर-मंतर ने देश की राजधानी में विरोध की आवाज उठाने के प्रमुख ठिकाने के रूप में अपनी जगह बनाई। तीन दशक से अधिक समय तक जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर पहलवानों के धरने तक कई बड़े प्रदर्शन आयोजित हुए।

नई व्यवस्था के लागू होने के बाद अब विरोध प्रदर्शनों के लिए तय किए गए नए स्थल संसद भवन से काफी दूरी पर स्थित हैं। जंतर-मंतर से रामलीला मैदान की दूरी करीब तीन किलोमीटर है, जबकि पूर्वी दिल्ली का सीबीडी मैदान संसद से लगभग 12 किलोमीटर और बुराड़ी मैदान करीब 23 किलोमीटर दूर है। प्रशासन के लिए इन बाहरी और विस्तृत इलाकों में भीड़ तथा यातायात नियंत्रित करना भले ही सुगम हो, लेकिन प्रदर्शनकारियों के लिए सरकार तक अपनी मांगें पहुंचाना अब पहले की तुलना में काफी कठिन हो गया है।

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