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विश्लेषण

जीएसटी काउंसिल की बैठक में गिरफ्तारी के नियमों और कर अधिकारियों की शक्तियों पर विचार किया जाएगा

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जीएसटी काउंसिल की बैठक में प्री-प्रॉसिक्यूशन यानी अभियोजन से पहले के चरण में गिरफ्तारी की शक्तियों को हटाने और टैक्स अधिकारियों के पास मौजूद अनावश्यक नियंत्रण को समाप्त करने पर विचार किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में गिरफ्तारी के प्रावधानों के कारण व्यवसायों पर अनुचित दबाव बन जाता है।

प्रस्ताव के अनुसार, भविष्य में कर विवादों का निपटारा सिविल परिणामों के जरिए किया जाएगा, जिसमें कर की वसूली, विलंब ब्याज और जुर्माना शामिल हैं। हालांकि, गंभीर मामलों में अभियोजन का विकल्प खुला रहेगा और इसके लिए सीमा को 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये किए जाने की संभावना है।

दूसरी ओर, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सहित कम से कम पांच प्रमुख राज्यों ने कर अधिकारियों की शक्तियों में किसी भी तरह की व्यापक कटौती पर चिंता जताई है। इन राज्यों का मुख्य रुख यह है कि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए और गंभीर उल्लंघनों के मामलों में ‘सिविल गिरफ्तारी’ का अतिरिक्त प्रावधान होना चाहिए।

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काउंसिल की बैठक में प्रक्रियागत सुधारों, रिफंड, निर्यात और ई-कॉमर्स से जुड़े पांच अन्य प्रमुख क्षेत्रों पर भी विचार-विमर्श होगा। पिछले नौ वर्षों में विकसित हुई तकनीकी प्रणाली को आधार बनाते हुए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सिस्टम डेटा के आधार पर काम करे और अधिकारियों को केवल निर्णय लेने वाले मामलों पर ध्यान केंद्रित करना पड़े।

रिफंड प्रक्रिया के तहत, दावों को 10 दिन के भीतर स्वीकार करने और जोखिम जांच के बाद 90 प्रतिशत राशि जारी करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, 10,000 रुपये से कम राशि के मामलों में कोई नोटिस जारी न करने का प्रस्ताव है, जो नए मामलों के साथ-साथ adjudication या अपील के स्तर पर लंबित मामलों पर भी लागू होगा।

रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए प्रस्ताव है कि 61 प्रतिशत करदाताओं को तीन कार्य दिवसों में स्वचालित रूप से पंजीकरण मिल जाए और 66 प्रतिशत संशोधन आवेदन बिना किसी अधिकारी के हस्तक्षेप के स्वीकार किए जाएं। इसके साथ ही, एक बार के होम-स्टेट वेरिफिकेशन के जरिए छोटे विक्रेताओं को पूरे देश में व्यापार करने की सुविधा देने का प्रस्ताव भी काउंसिल के एजेंडे में शामिल है।

सेवाओं के निर्यात के नियमों में बदलाव करते हुए, भारत में विदेशी ग्राहकों के लिए की जाने वाली टेस्टिंग, रिपेयर, सर्टिफ़िकेशन और रिसर्च जैसी सेवाओं को निर्यात का दर्जा दिए जाने पर चर्चा होगी, भले ही वस्तुएं देश के भीतर ही रहें।

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