उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपनी रणनीति में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। आंतरिक सर्वे और जनता के बीच कमजोर जनाधार वाले लगभग 100 विधायकों के टिकट पर इस बार खतरा मंडरा रहा है। पार्टी इस मामले में 2024 के लोकसभा चुनाव जैसी गलतियां दोबारा नहीं दोहराना चाहती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी ने विधानसभा स्तर पर आंतरिक सर्वेक्षण कराए हैं, जिसमें कई विधायकों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) और स्थानीय पदाधिकारियों के साथ मतभेदों की बात सामने आई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से भी विधायकों के कामकाज पर फीडबैक लिया गया है। इन सभी पैमानों पर खरे न उतरने वाले विधायकों को इस बार चुनावी मैदान से बाहर किया जा सकता है।
बीजेपी के सामने इस बार दोहरी चुनौती है। एक तरफ जहां लगातार दो बार से सरकार में होने के कारण कई विधायक दस सालों से एक ही सीट पर काबिज हैं, जिससे उनके खिलाफ असंतोष देखा जा रहा है; वहीं दूसरी तरफ पार्टी को सामाजिक समीकरणों को भी साधना है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले चुनाव में सवर्ण वोटों के छिटकने से पार्टी को नुकसान हुआ था, जिसके चलते इस बार पार्टी का फोकस दलित मतदाताओं पर भी रहेगा। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले से निपटने के लिए भी पार्टी सतर्क है।
लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी में बीजेपी की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं। पार्टी ने तब 49 पुराने सांसदों को दोबारा टिकट दिया था, जिनमें से 27 को हार का सामना करना पड़ा था। इसी अनुभव से सीखते हुए पार्टी आलाकमान इस बार टिकट वितरण में वरिष्ठता के बजाय केवल जीत की संभावना को सबसे बड़ा आधार बना रहा है। पुराने चेहरों की जगह नए और युवा चेहरों को मैदान में उतारने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि जनरेशन-जी और बदलते सियासी माहौल से निपटा जा सके। हालांकि, पार्टी नेताओं का यह भी कहना है कि यदि किसी वरिष्ठ विधायक का जनाधार मजबूत है और उसकी जीत की संभावना बनी हुई है, तो उसके कार्यकाल की अवधि आड़े नहीं आएगी।

