नदियों के एक बार नष्ट हो जाने पर उनकी भरपाई नहीं की जा सकती। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने अवैध नदी रेत खनन के मामलों की सुनवाई करते हुए की है। इसके साथ ही अदालत ने देश भर में अवैध रेत खनन पर एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी (CEC) को दिया है। इस निर्देश के साथ ही शीर्ष अदालत ने अपने इस मामले में जांच के दायरे का विस्तार कर दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए पूरे देश के स्तर पर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। अदालत ने चंबल नदी में हो रहे अवैध खनन के मामलों का स्वतः संज्ञान लिया था। राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य के भीतर हो रहे इस अवैध खनन पर कई आदेश पारित किए जाने के बावजूद अवैध गतिविधियां बेरोक-टोक जारी रहने पर अदालत ने गहरी चिंता जताई।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकारों को इस बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध निष्कर्षण के लिए जिम्मेदार संगठित गिरोहों की पहचान करने में विफल रहने पर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने राजस्थान सरकार को चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो राज्य की सभी नदियों में रेत खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। अदालत ने कहा कि जब तक् वाहन जुर्माना भरकर छूटते रहेंगे और माफियाओं पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक नरमी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारों को आदेशों का पालन कराने में सक्रियता दिखानी होगी।
अदालत ने केन नदी में हो रहे अवैध रेत खनन से जुड़ी एक अन्य याचिका पर भी सुनवाई की। इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया गया है कि बिना किसी वैध सरकारी अनुबंध के नदी के भीतर भारी excavators और sand-pulling pumps कैसे लगाए गए।
सुनवाई में एमीकस क्यूरी के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल और अधिवक्ता रुपाली फ्रांसेस्का सैमुअल ने अदालत की सहायता की और चंबल अभ्यारण्य से जुड़े आदेशों के अनुपालन पर एक नोट प्रस्तुत किया। अदालत को यह भी बताया गया कि पिछले महीने ड्यूटी पर तैनात प्रताप सिंह चुंडावत नामक एक वन रेंजर्स की अवैध रेत ले रहे डम्पर से कुचलकर मौत हो गई थी।
सीईसी ने अपनी रिपोर्ट में वन अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा दिए जाने का मुद्दा भी उठाया है। समिति ने सुझाव दिया है कि ओडिशा और असम की तर्ज पर वन रक्षकों को भी कर्तव्य निर्वहन के दौरान अभियोजन से सुरक्षा मिलने से सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। इसके अलावा रिक्त पदों को भरने, निगरानी ढांचे के लिए वित्तीय सहायता, और नियमित पारिस्थितिक निगरानी जैसे उपाय सुझाए गए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई चार नवंबर को तय की गई है।

