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सरकार ने कैंसर की 137 दवाओं पर मुनाफाखोरी रोकने के लिए तय की मार्जिन सीमा

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नई दिल्ली —

भारत सरकार ने कैंसर के इलाज को किफायती बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए 137 कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत का ट्रेड मार्जिन कैप (मुनाफे की अधिकतम सीमा) लागू कर दिया है। अगले महीने से लागू होने वाले इस नए मूल्य नियंत्रण से इन जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें 70 प्रतिशत तक कम होने की संभावना है। औषध विभाग के अनुसार, इस कदम से देश के कैंसर रोगियों को सालाना 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी और वे अपनी जेब से होने वाले भारी-भरकम खर्च से बच सकेंगे।

यह प्रशासनिक कदम केरल की एक सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी सरोजम राधाकृष्णन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई कानूनी लड़ाई के बाद उठाया गया है। वर्ष 2021 में स्तन कैंसर से पीड़ित पाई गईं राधाकृष्णन ने अत्यधिक मूल्य वृद्धि और मुनाफाखोरी के खिलाफ 2022 में केरल उच्च न्यायालय का रुख किया था। हालांकि, सितंबर 2022 में मामले के विचाराधीन रहने के दौरान ही उनका निधन हो गया था, लेकिन उनकी ओर से शुरू की गई यह कानूनी पहल देश भर के कैंसर मरीजों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुई है।

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इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने अस्पतालों और खुदरा विक्रेताओं द्वारा कैंसर की दवाओं पर वसूले जाने वाले भारी मुनाफे को ‘हत्याकांड’ (कार्नेज) और ‘जबरन वसूली’ (एक्सटॉर्शन) करार दिया था। 29 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने उदाहरण देते हुए कहा था कि अस्पतालों को 2,700 रुपये में आपूर्ति की जाने वाली एक जीवन रक्षक कैंसर दवा मरीजों को 27,000 रुपये तक के बढ़े हुए दामों पर बेची जा रही थी।

नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के विश्लेषण से यह खुलासा हुआ था कि कुछ कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्क-अप औसतन 170 प्रतिशत तक था, जबकि कुछ चरम मामलों में यह 700 प्रतिशत से भी अधिक पाया गया। इससे पहले केवल 42 दवाओं पर 30 प्रतिशत का ट्रेड मार्जिन कैप लागू था, जिसे अब सरकार ने दायरा बढ़ाते हुए 137 अन्य कैंसर दवाओं पर भी लागू कर दिया है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य फाउंडेशन (Public Health Foundation of India) के अध्ययनों के अनुसार, देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला भारी खर्च हर साल लगभग 5.5 करोड़ भारतीयों को गरीबी रेखा से नीचे धकेल देता है। भारत में हर साल कैंसर के लगभग 15.6 लाख नए मामले सामने आते हैं, जबकि 2020 में यह आंकड़ा 13.9 लाख था। वित्तीय तंगी के कारण कई मरीज बीच में ही कीमोथेरेपी या विकिरण उपचार बंद करने को मजबूर हो जाते हैं। हालांकि सरकार की आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के तहत कुछ प्रकार के कैंसर के इलाज के लिए प्रति परिवार 5 लाख रुपये तक का वार्षिक कवरेज दिया जाता है, फिर भी अधिकांश खर्च मरीजों को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सरकार के वकीलों से यह भी सवाल किया है कि यह मूल्य सीमा केवल कैंसर तक ही क्यों सीमित होनी चाहिए और इसे गैर-पेटेंट वाली सभी प्रकार की दवाओं पर क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिए। अदालत ने सरकार को इस पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए 27 अक्टूबर तक का समय दिया है।

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